शनिवार, 19 अप्रैल 2014

"कस्तूरी -मृग"



तुम्हे क्या उपहार दूँ 
कैसे सर्वस्व त्याग दूँ
बीते निशा के कितने प्रहर कैसे 
उनका कैसे हिसाब दूँ 
कैसे बताऊ संवेदना कितनी बार रूठी हैं 
और मैंने कितनी बार कैसे उसे मनाया 
जीर्ण -शीर्ण होता रहा हर बार 
फिर भी नित दिन नए सोपान चढ़ता रहा 
संवेदनाओं के धरातल पर खुद ही को छलता रहा 
निज धर्म ,देश काल में 
कैसे धार्मिकता त्याग दूँ
कानन के बीच कस्तूरी मृग बन 
कब तक कितना विचरण करूँ 
तुम ही कहो तुम्हे क्या उपहार दूँ 
किस नयी उपमा को तुम  पर वार दूँ 
तुम ही कहो तुम्हे क्या उपहार दूँ 


बुधवार, 16 अप्रैल 2014

"मैं नदी हूँ "

मैं नदी हूँ
सुमेरु से चली ,अनेकों रूप धर बही
सघन कानन के बीच से 
दिव्य वह जिस प्रदेश से 
किसी उत्तान से गिरी निर्झर बनी 
आरूढ़ हो धरा पर 
अब भी हुयी मैं ही धनी 
मेरे ही तट पर अंकुरित होती रही हैं सभ्यताएं 
मेरी ही गोद खेले हैं अनेकों गीत ,कहानियां और परम्पराएं 
संस्कृतियों की पुंज हूँ 
मैं नदी हूँ 
मैं अविछिन्न हौं ,अविजित हूँ 
मैं ज्ञेय हूँ ,मैं अज्ञेय हूँ
तट बंध हूँ , तट मुक्त हूँ 
गौरवमयी इतिहास सदा मेरा रहा 
किञ्चित भविष्य का विश्वास मुझको भी रहा हैं नहीं 
करुण व्यथा किस से कहूँ 
मुझे लिवाने पयोधि स्वयं आते हैं 
मिलन का उत्सव साडी प्रकृति मनती हैं
यह वही देश
जिसका सम्बोधन मुझको "देवी" है 
विशिष्ट ज्ञान जागा जो मेरी दिशाएं बांधता हैं 
मैं व्यथित हूँ 
फिर भी मैं बहु अखंडित
सर्वत्र बहु इस हेतु ही अभिशप्त हूँ 
काल में विकराल हूँ 
मैं नदी हूँ

झील चुप हैं ,

झील चुप हैं ,
पर झील का पानी बहुत बोलता हैं तुम्हारे कानों में 
झील अपनी आखें बंद किये ,कुछ नहीं देखती 
झील का पानी देखता हैं तुमको 
झील की हथेली पर एक तिल देखा हैं 
झील के पानी ने एक बूंद आंसू की गिराई हैं 
झील एक आदत हैं ,झील के पानी की 
झील के पानी की प्रार्थना हैं झील 
झील चुप हैं 
कब से ,झील भी नहीं जानती 
उसके शब्द ,वाक्य, भाषाएँ कौन सी हैं 
क्या कोई जानता हैं 
तुम्हारे होने न होने से झील नहीं हैं 
झील हैं सनातन प्रतीक्षारत तुम्हारे होने की 
तुम झील पर कुछ देर ठहर कर चले जाते हो 
झील नहीं जाती कही 
वह नहीं कहती कभी फिर आना 
फिर भी तुम लौट आते हो एक समय पर
झील चुप हैं ,
पर झील का पानी बहुत बोलता हैं तुम्हारे कानों में