बुधवार, 16 अप्रैल 2014

"मैं नदी हूँ "

मैं नदी हूँ
सुमेरु से चली ,अनेकों रूप धर बही
सघन कानन के बीच से 
दिव्य वह जिस प्रदेश से 
किसी उत्तान से गिरी निर्झर बनी 
आरूढ़ हो धरा पर 
अब भी हुयी मैं ही धनी 
मेरे ही तट पर अंकुरित होती रही हैं सभ्यताएं 
मेरी ही गोद खेले हैं अनेकों गीत ,कहानियां और परम्पराएं 
संस्कृतियों की पुंज हूँ 
मैं नदी हूँ 
मैं अविछिन्न हौं ,अविजित हूँ 
मैं ज्ञेय हूँ ,मैं अज्ञेय हूँ
तट बंध हूँ , तट मुक्त हूँ 
गौरवमयी इतिहास सदा मेरा रहा 
किञ्चित भविष्य का विश्वास मुझको भी रहा हैं नहीं 
करुण व्यथा किस से कहूँ 
मुझे लिवाने पयोधि स्वयं आते हैं 
मिलन का उत्सव साडी प्रकृति मनती हैं
यह वही देश
जिसका सम्बोधन मुझको "देवी" है 
विशिष्ट ज्ञान जागा जो मेरी दिशाएं बांधता हैं 
मैं व्यथित हूँ 
फिर भी मैं बहु अखंडित
सर्वत्र बहु इस हेतु ही अभिशप्त हूँ 
काल में विकराल हूँ 
मैं नदी हूँ

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