आज मुझको चिड़िया ने ड़ाँटा है
चिड़े ने फटकार लगाई है
मेरा मन काँपा है
एक मौन रूलाई आयी है
हुआ कुछ यूँ कल रात
मेरे हाथों बिजली का फ्युज उड़ गया पिछली रात
मेरे घर के,
मीटर के नीचें
चिड़ा चिड़ी ने,
ड़ेरा जमाया ब्याह के बाद
नन्हें बच्चों ने जन्म पाया
मीटर के नीचे ही
अपना स्वर्ग जैसा घर पाया
मैं पहुँचा उनके स्वर्ग के नजदीक
मुझको कोई आतकी जान
कितना चिड़ा चिड़ी ने शोर मचाया
मुझको भी चिड़िया के छोटे बच्चों ने
अपना पीली चोंच वाला मुँह दिखलाया
डराया है,
लौटा हूँ
मेरे पीछे पीछे आकर
आज मुझको चिड़िया ने ड़ाँटा है
चिड़े ने फटकार लगाई है
बिना पूछे नहीं आते उसके घर में
क्या ऐसी ही सभ्यता तुमने पाई है।
आज मुझको चिड़िया ने ड़ाँटा है
चिड़े ने फटकार लगाई है।
मंगलवार, 29 जुलाई 2008
भूलना एक अच्छी आदत है
भूलना एक अच्छी आदत है
इसकी एक योजना बनानी चाहिए
क्या हमें भूलना हैं ?
और क्या नहीं,
ताकि समय रहते जब तक वह स्थिति, वस्तु, गंध, ध्वनि, स्पर्ष
सामने भी आ जावे तो
हमारा मन उसे न पहचाने
पहचानते हुए भी
यह केवल प्रदर्षन मात्र न हो भुलने का
रोंम - रोंम कहे कि
तुम सब विस्तृत कर चुके हो
सभी अनुभवों सहित
वर्तमान में तुम बिल्कुल कोरे हो
अभी कसे कैनवास की तरह
इसकी एक योजना बनानी चाहिए
क्या हमें भूलना हैं ?
और क्या नहीं,
ताकि समय रहते जब तक वह स्थिति, वस्तु, गंध, ध्वनि, स्पर्ष
सामने भी आ जावे तो
हमारा मन उसे न पहचाने
पहचानते हुए भी
यह केवल प्रदर्षन मात्र न हो भुलने का
रोंम - रोंम कहे कि
तुम सब विस्तृत कर चुके हो
सभी अनुभवों सहित
वर्तमान में तुम बिल्कुल कोरे हो
अभी कसे कैनवास की तरह
दो सड़कों के बीच
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
कोई न जाने
कोई न माने
सब हो गयी पुरानी रीत
बँटता जा रहा पूरा संसार
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
आप ही गाना
और आप ही बजाना
अपनी ही धुन पर चाहे सबको नचाना
ऐसी ही हो गई आजकल की नीत
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
क्या घर
क्या बाजार बचा
होठों की मुस्कानों पर कौन सा - सौदा सजा
बहुत लगाई जुगत अब की बार
पर नहीं बचा
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
इस ओर रोज दीवाली हैं
हर रोज प्याला होता खाली है
उस ओर भी दीवाली
वहाँ हर रोज होती मैय्यत की तैयारी है
भूख से, बीमारी से
या दुर्घटना से
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
भोगवाद भी अंधी - आँधी
कौन कहेगा - जय गाँधी
बाकी की तो कोई स्मृति नहीं रही कोई विषेष
यह कौन सा देश
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
कोई न जाने
कोई न माने
सब हो गयी पुरानी रीत
बँटता जा रहा पूरा संसार
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
आप ही गाना
और आप ही बजाना
अपनी ही धुन पर चाहे सबको नचाना
ऐसी ही हो गई आजकल की नीत
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
क्या घर
क्या बाजार बचा
होठों की मुस्कानों पर कौन सा - सौदा सजा
बहुत लगाई जुगत अब की बार
पर नहीं बचा
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
इस ओर रोज दीवाली हैं
हर रोज प्याला होता खाली है
उस ओर भी दीवाली
वहाँ हर रोज होती मैय्यत की तैयारी है
भूख से, बीमारी से
या दुर्घटना से
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
भोगवाद भी अंधी - आँधी
कौन कहेगा - जय गाँधी
बाकी की तो कोई स्मृति नहीं रही कोई विषेष
यह कौन सा देश
दो सड़कों के बीच
खड़ा कबीरा, देता रह गया सीख
यत्न
एक बार फिर क्या होऊँ तैयार
हाँ, वही असफलता
यह कौन सी बार
विपद् का लेखा-जोखा
टूटा अंतर का, एक और तार
हुआ नहीं क्यों कर ऐसा इस बार
सर्वत्र
सुफलित होता दिन - यान
सतत् क्रियाशील यह
मन का क्या कोई हो सकता है प्रतिहारी
माटी-माटी छूता जाता
नव अंकुरित हो जाता
हाँ, वही पतझड़ फिर एक बार
भर ग्रीष्म में
खिला वही अमलतास
हाँ, वही असफलता
यह कौन सी बार
विपद् का लेखा-जोखा
टूटा अंतर का, एक और तार
हुआ नहीं क्यों कर ऐसा इस बार
सर्वत्र
सुफलित होता दिन - यान
सतत् क्रियाशील यह
मन का क्या कोई हो सकता है प्रतिहारी
माटी-माटी छूता जाता
नव अंकुरित हो जाता
हाँ, वही पतझड़ फिर एक बार
भर ग्रीष्म में
खिला वही अमलतास
प्रकृति-१
वसुधा पर फैले
द्रुम - कूल
खिला एक पावस का फूल
उस पर
ओस कि चार बूँद
सप्त अश्व की पद चाप सुन
अपने ही अंतर में
छुप जाती
द्रुम - कूल
खिला एक पावस का फूल
उस पर
ओस कि चार बूँद
सप्त अश्व की पद चाप सुन
अपने ही अंतर में
छुप जाती
विरासत
मुझे विरासत में क्या मिला
बस दो गज जमीन
और आधी टूटी हुई तलवार
तुमने दो गज जमीन
पर भी खींच दी दीवार
और उस पर अपने
शौर्य गाथा के परचे चिपका दिये
क्या मिला उस पर भी उन लोगों को
थमा दी आधी टूटी तलवार
केवल यह कहकर,
यदि कोई दीवार के
इस पार से झाँके भी तो
उतार देना उसके पार
दीवार क्या थी
बस! दो गज जमीन पर बनी दीवार
दो संप्रदायो के बीच की दीवार
यह जानने के बावजूद
दीवार से दीवार सटी हुई है
जाने कितनी दीवारें बनी हुई हैं
अब भी बनने को हैं युद्धरत
इनका पतन होगा भी नहीं
शायद और शायद कोई नहीं जानता
दीवारें खण्ड-खण् हो गई हैं
इतना लघु रूप धारण
कर लिया है इन्होंने
युद्धों की शौर्य गाथाओं में
बँट-बँट कर
ये मेरी विरासत है
मेरी विरासत भी दीवार
गर्व करूँ!
या लज्जा से मस्तक नीचा
क्या बस यही था मेरा भूतकाल
जो भविष्य बनने को है
मुझे भी क्या यही देना है
विरासत अगली पीढ़ी को
मुझे विरासत में क्या मिला
बस! दो गज जमीन और आधी टूटी - तलवार
बस दो गज जमीन
और आधी टूटी हुई तलवार
तुमने दो गज जमीन
पर भी खींच दी दीवार
और उस पर अपने
शौर्य गाथा के परचे चिपका दिये
क्या मिला उस पर भी उन लोगों को
थमा दी आधी टूटी तलवार
केवल यह कहकर,
यदि कोई दीवार के
इस पार से झाँके भी तो
उतार देना उसके पार
दीवार क्या थी
बस! दो गज जमीन पर बनी दीवार
दो संप्रदायो के बीच की दीवार
यह जानने के बावजूद
दीवार से दीवार सटी हुई है
जाने कितनी दीवारें बनी हुई हैं
अब भी बनने को हैं युद्धरत
इनका पतन होगा भी नहीं
शायद और शायद कोई नहीं जानता
दीवारें खण्ड-खण् हो गई हैं
इतना लघु रूप धारण
कर लिया है इन्होंने
युद्धों की शौर्य गाथाओं में
बँट-बँट कर
ये मेरी विरासत है
मेरी विरासत भी दीवार
गर्व करूँ!
या लज्जा से मस्तक नीचा
क्या बस यही था मेरा भूतकाल
जो भविष्य बनने को है
मुझे भी क्या यही देना है
विरासत अगली पीढ़ी को
मुझे विरासत में क्या मिला
बस! दो गज जमीन और आधी टूटी - तलवार
चौराहे की मूर्ति
राहों को बाँटता है
चौराहा
चौराहे पर मूर्ति
खड़ी मूर्ति
या फिर
बैठी
आधी या फिर
पूरी मूर्ति
अचेत सी खड़ी
मूर्ति/बैठी मूर्ति
चौराहे पर नज़र रखे मूर्ति
देखा क्या-क्या नहीं
इस मूर्ति ने
दंगे हो या
मारी-मारी
कर्फ़्यू हो या
बीच सड़क पर
किसी को लुटते
लाचारों के साथ होता
दुराचार
या फिर
किसी को घर से बेघर होते
बेघर हुए कुछ
शरीरों को शरण
भी दी है इसने
पर बहुत कम समय के लिए
चुपचाप
मौन खड़ी या मौन बैठी मूर्ति
मौन है
इसके निर्माण से अब तक
इसका मौन ही बोलता है
चिल्लाता है,
किसी जाते हुए जुलुस में नारे भी लगाता है,
क्योकि यह मूर्ति प्रतीक है
हमारे कुछ न कह पाने की
मौन में
खड़ी या फिर बैठी मूर्ति
हर चौराहे पर
मूर्ति
मौन मूर्ति
चौराहा
चौराहे पर मूर्ति
खड़ी मूर्ति
या फिर
बैठी
आधी या फिर
पूरी मूर्ति
अचेत सी खड़ी
मूर्ति/बैठी मूर्ति
चौराहे पर नज़र रखे मूर्ति
देखा क्या-क्या नहीं
इस मूर्ति ने
दंगे हो या
मारी-मारी
कर्फ़्यू हो या
बीच सड़क पर
किसी को लुटते
लाचारों के साथ होता
दुराचार
या फिर
किसी को घर से बेघर होते
बेघर हुए कुछ
शरीरों को शरण
भी दी है इसने
पर बहुत कम समय के लिए
चुपचाप
मौन खड़ी या मौन बैठी मूर्ति
मौन है
इसके निर्माण से अब तक
इसका मौन ही बोलता है
चिल्लाता है,
किसी जाते हुए जुलुस में नारे भी लगाता है,
क्योकि यह मूर्ति प्रतीक है
हमारे कुछ न कह पाने की
मौन में
खड़ी या फिर बैठी मूर्ति
हर चौराहे पर
मूर्ति
मौन मूर्ति
पुनर्जन्म के बाद
हम लौट कर
फिर से
उसी जगह जाना
चाहते हैं जहाँ से
हमारी सारी की सारी
आस्था या कि सभ्यता
पंख लगाकर
उन्मुक्त होकर
खुले आकाश में उड़ती है।
क्योकि
धीरे-धीरे पंछी को
एक खुला आकाश भी
अनंत की कैद
लगने लगता है
वो उससे मुक्त होने की
असफल भरसक
कोशिशें करना चाहता है
पर
सब नाकाम
फिर से
उसी जगह जाना
चाहते हैं जहाँ से
हमारी सारी की सारी
आस्था या कि सभ्यता
पंख लगाकर
उन्मुक्त होकर
खुले आकाश में उड़ती है।
क्योकि
धीरे-धीरे पंछी को
एक खुला आकाश भी
अनंत की कैद
लगने लगता है
वो उससे मुक्त होने की
असफल भरसक
कोशिशें करना चाहता है
पर
सब नाकाम
दृष्टा
जन्म की तरह एक और
जन्म,
मृत्यु की तरह एक और
मृत्यु
स्पष्ट दिखाई देता है
मध्य का इनके रिक्त स्थान
जिसमें भरे जा सकते हैं
अनेक शब्द, वाक्य, व्याख्याएँ,
कुछ भी, केवल यथार्य बोध से शायद परे
जो नग्न आँखे देखती हैं,
जो नग्न ऑखे नहीं भी देखती हैं
तुम महसूस भी कर सकते हो
एक महक
हो सकता है चुप्पी साधे बैठा हो
तुम्हारा मेरा
बिल्कुल अपरिचित मन
जन्म,
मृत्यु की तरह एक और
मृत्यु
स्पष्ट दिखाई देता है
मध्य का इनके रिक्त स्थान
जिसमें भरे जा सकते हैं
अनेक शब्द, वाक्य, व्याख्याएँ,
कुछ भी, केवल यथार्य बोध से शायद परे
जो नग्न आँखे देखती हैं,
जो नग्न ऑखे नहीं भी देखती हैं
तुम महसूस भी कर सकते हो
एक महक
हो सकता है चुप्पी साधे बैठा हो
तुम्हारा मेरा
बिल्कुल अपरिचित मन
बाजार में
बाजार में
न कुछ ख़रीद पाते हैं
न कुछ बेच पाते हैं
लगाते हैं चार चक्कर
निहारते हैं टँगे बिजली के लट्टुओं को
बच जाते हैं चमचमाती क्वालिस के
सामने आने से,
मुँह फेर कुछ बुदबुदाते हैं
बढ़ता एक जुलूस सामने
उसमें फैलता भेदभाव
क्षण भर को डर जाते हैं
फिर भी
गुनगुनाते हुए कोई आशावादी गीत
लौट जाते हैं घर को
जब भी आते हैं
बाजार में।
न कुछ ख़रीद पाते हैं
न कुछ बेच पाते हैं
लगाते हैं चार चक्कर
निहारते हैं टँगे बिजली के लट्टुओं को
बच जाते हैं चमचमाती क्वालिस के
सामने आने से,
मुँह फेर कुछ बुदबुदाते हैं
बढ़ता एक जुलूस सामने
उसमें फैलता भेदभाव
क्षण भर को डर जाते हैं
फिर भी
गुनगुनाते हुए कोई आशावादी गीत
लौट जाते हैं घर को
जब भी आते हैं
बाजार में।
परिवर्तन-२
एक परिर्वतन
महसूस करती हैं
सभी इन्द्रियाँ
बिना एक दूसरे को बनाए
अपने अपने अनुभव
सभी परिभाषाएँ
परिभाषा के कथ्य से आगे
कहीं बहुत आगे निकल कर
पीछे मुड़कर देखती हैं
विखण्डित मान्यताओं के समूह
कई बार
आमने-सामने होते हैं
बिल्कुल गूंगे-बहरों की तरह
महसूस करती हैं
सभी इन्द्रियाँ
बिना एक दूसरे को बनाए
अपने अपने अनुभव
सभी परिभाषाएँ
परिभाषा के कथ्य से आगे
कहीं बहुत आगे निकल कर
पीछे मुड़कर देखती हैं
विखण्डित मान्यताओं के समूह
कई बार
आमने-सामने होते हैं
बिल्कुल गूंगे-बहरों की तरह
कामना
उन्नत विचार हो
निष्पक्ष भाव हो
नवसृजन को
प्रोन्नती का लगाव हो
सर्व जनों में
सम भाव हो
सार्वभौम श्रद्धा हो
जन का मन
जन जन से मिले
सुन्दरता का संचार हो
विकास हो
केवल
विकास हो
उन्नत विचार हो
निष्पक्ष भाव हो
नवसृजन को
प्रोन्नती का लगाव हो
सर्व जनों में
सम भाव हो
सार्वभौम श्रद्धा हो
जन का मन
जन जन से मिले
सुन्दरता का संचार हो
विकास हो
केवल
विकास हो
उन्नत विचार हो
कविता में
एक प्रेम कविता के
लिए प्रेमी
एक दंगे पर की कविता के
लिए दंगाई
एक भूखे बच्चे की कविता के
लिए स्वंय भूखा
एक स्त्री की व्यथा की कविता के
लिए स्त्री
एक अतिमहात्वाकांक्षी कविता के
लिए अतिमहात्वाकांक्षी चरित्र
एक आदर्शवादी कविता के
लिए आदर्शवादी जीवन
जैसी कविता के लिए
वैसा ही संस्कार
कितना आवश्यक है
ऐसा नहीं यदि तो
क्या कविता में भी
पेशागत विशेषता -
बहूवचन सहित
उपस्थित है!
(अल्पविराम से पहले)
लिए प्रेमी
एक दंगे पर की कविता के
लिए दंगाई
एक भूखे बच्चे की कविता के
लिए स्वंय भूखा
एक स्त्री की व्यथा की कविता के
लिए स्त्री
एक अतिमहात्वाकांक्षी कविता के
लिए अतिमहात्वाकांक्षी चरित्र
एक आदर्शवादी कविता के
लिए आदर्शवादी जीवन
जैसी कविता के लिए
वैसा ही संस्कार
कितना आवश्यक है
ऐसा नहीं यदि तो
क्या कविता में भी
पेशागत विशेषता -
बहूवचन सहित
उपस्थित है!
(अल्पविराम से पहले)
घर
एक जगह से दूसरी जगह
भागते हुए और
भगाते हुए भी
किसी क्षण यह अहसास नहीं होता
कि बेघर हो गए
वरन् स्थानांतरण का एक अलौकिक अनुभव वह
राजमार्ग से चार हाथ दूर बना वह
घर हाँ, उसमें नहीं है कोई भेद
नहीं है कोई निश्चित दीवार
जिस पर नहीं टाँगी जा सके कोई लैंडस्केप तस्वीर
रखने की जगह नहीं है कोई फूलदान
फूलदान जरूर हम बनाते हैं
उसमें नहीं है कोई भी समान जिसकी
चिंता में घर न सूना छोड़ा जा सके
इसे बनाने में किसी वास्तुशास्त्री की जरूरत नहीं पड़ी
न ही इसे सजाया है किसी इंटीरियर डेकोरेटर ने
शासकीय तौर पर यह अवैध है
पर तुम्हें बता दूँ यह घर है
जिसमें शाम को मजूरी पर से आकर
बाजरे के रोटले खा कर
राजमार्ग से चार हाथ दूर पड़ी खाट
पर सो जाता हूँ निश्चिंत
हाँ बिल्कुल निश्चिंत होकर
राजमार्ग से चार हाथ दूर यह
घर है मेरा
उठने के लिए अगली सुबह
और वापिस लौटने के लिए घर पर
यायावरी करते हुए हो गया है
अब बहुत समय
भागते हुए और
भगाते हुए भी
किसी क्षण यह अहसास नहीं होता
कि बेघर हो गए
वरन् स्थानांतरण का एक अलौकिक अनुभव वह
राजमार्ग से चार हाथ दूर बना वह
घर हाँ, उसमें नहीं है कोई भेद
नहीं है कोई निश्चित दीवार
जिस पर नहीं टाँगी जा सके कोई लैंडस्केप तस्वीर
रखने की जगह नहीं है कोई फूलदान
फूलदान जरूर हम बनाते हैं
उसमें नहीं है कोई भी समान जिसकी
चिंता में घर न सूना छोड़ा जा सके
इसे बनाने में किसी वास्तुशास्त्री की जरूरत नहीं पड़ी
न ही इसे सजाया है किसी इंटीरियर डेकोरेटर ने
शासकीय तौर पर यह अवैध है
पर तुम्हें बता दूँ यह घर है
जिसमें शाम को मजूरी पर से आकर
बाजरे के रोटले खा कर
राजमार्ग से चार हाथ दूर पड़ी खाट
पर सो जाता हूँ निश्चिंत
हाँ बिल्कुल निश्चिंत होकर
राजमार्ग से चार हाथ दूर यह
घर है मेरा
उठने के लिए अगली सुबह
और वापिस लौटने के लिए घर पर
यायावरी करते हुए हो गया है
अब बहुत समय
इस सदी की कविता
जब लिखा जाएगा
इस सदी का इतिहास
तब शायद न बची हो कोई भी जमीन रिक्त
जिस पर खेलते हो बच्चे
गिल्ली-डंडा या फिर कंचे
न उड़ती होगी पंतगें उतनी
जितनी बचपन में मैंने देखी हैं
तब-जब बच्चों से उनका
बचपन छिन जाएगा
सब तरफ जब केवल वैश्विकरण छा जाएगा
न कर सकेगें बात हम
मौलिक चितंन कि जब
हर वाक्य मानसिक गुलामी का द्योतक बन जाएगा
तब कविता फालतू मानी जाने लगेगी
तब शायद
न रह जायेगा इस सदी में कुछ तलाशने को
तब तुम
कम्प्यूटर पर बैठ कर लिखना
इस सदी की कविता
इस सदी का इतिहास
तब शायद न बची हो कोई भी जमीन रिक्त
जिस पर खेलते हो बच्चे
गिल्ली-डंडा या फिर कंचे
न उड़ती होगी पंतगें उतनी
जितनी बचपन में मैंने देखी हैं
तब-जब बच्चों से उनका
बचपन छिन जाएगा
सब तरफ जब केवल वैश्विकरण छा जाएगा
न कर सकेगें बात हम
मौलिक चितंन कि जब
हर वाक्य मानसिक गुलामी का द्योतक बन जाएगा
तब कविता फालतू मानी जाने लगेगी
तब शायद
न रह जायेगा इस सदी में कुछ तलाशने को
तब तुम
कम्प्यूटर पर बैठ कर लिखना
इस सदी की कविता
एक पल स्वतंत्रता
गुलामी
शायद हर एक के अंदर तक
मन मस्तिष्क तक
जगह बना बैठी है
प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष का प्रश्न
अब समकालिक नहीं प्रतीत होता
प्रकृति ने साहचर्य बनाया था
आश्रितता केवल एक पक्षीय
तुमने विकास के नाम पर
एक पक्षीय नियम गढे़
लेकिन तुमने कभी स्वीकारा नहीं
तुम्हारा तथाकथित विकास
गुलामी का विकास है
तो तुम क्या कर सकते हो - एक प्रश्न
इस तेज विकासवान कहे जाने वाले मनुष्यों से
तेज रफ्तार शहरों से
क्या तुम एक पल स्वतंत्रता
जिये हो
शायद हर एक के अंदर तक
मन मस्तिष्क तक
जगह बना बैठी है
प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष का प्रश्न
अब समकालिक नहीं प्रतीत होता
प्रकृति ने साहचर्य बनाया था
आश्रितता केवल एक पक्षीय
तुमने विकास के नाम पर
एक पक्षीय नियम गढे़
लेकिन तुमने कभी स्वीकारा नहीं
तुम्हारा तथाकथित विकास
गुलामी का विकास है
तो तुम क्या कर सकते हो - एक प्रश्न
इस तेज विकासवान कहे जाने वाले मनुष्यों से
तेज रफ्तार शहरों से
क्या तुम एक पल स्वतंत्रता
जिये हो
कार्तिक पूर्णिमा
कालिदास की नगरी में वह तट
जाता जिस ओर यह पथ
रामघाट पर बढ़ता जाता
धीरे-धीरे जमघट
संध्या की उस बेला में
होती है आरती
ढोल मँजीरे बजते हैं
जन जन इस ओर उमड़ते हैं
दीपदान करती माताएँ
कालिदास की शकुन्तलाएँ
उस शीतल, स्तब्ध जल में
छोड़ती दीपमालाएँ
अहा! दृश्य देख
किस जन के मन के तार न झँकृत होते जाते
सब गुणी जन यही कहते
कालिदास की नगरी का यह तट
आता इस ओर वही पथ
जाता जिस ओर यह पथ
रामघाट पर बढ़ता जाता
धीरे-धीरे जमघट
संध्या की उस बेला में
होती है आरती
ढोल मँजीरे बजते हैं
जन जन इस ओर उमड़ते हैं
दीपदान करती माताएँ
कालिदास की शकुन्तलाएँ
उस शीतल, स्तब्ध जल में
छोड़ती दीपमालाएँ
अहा! दृश्य देख
किस जन के मन के तार न झँकृत होते जाते
सब गुणी जन यही कहते
कालिदास की नगरी का यह तट
आता इस ओर वही पथ
रविवार, 27 जुलाई 2008
देश का भविष्य
हमने कुछ
नन्हें पौधे उपजाये हैं
सोचा था
पुष्प खिलेगें
नव बसंत में
नव प्रभात के
संग इनका
उत्पात मचेगा
हर तरू की शाखें
इनके लिए मनुहार गावेगी
मौन समीर
इनके यौवन की बात छिपाएगा
पर हो गयी
कहीं पर चूक - सदा से ही
इन्हे सींचने को
नीर
दूर देश से लाये हैं।
नन्हें पौधे उपजाये हैं
सोचा था
पुष्प खिलेगें
नव बसंत में
नव प्रभात के
संग इनका
उत्पात मचेगा
हर तरू की शाखें
इनके लिए मनुहार गावेगी
मौन समीर
इनके यौवन की बात छिपाएगा
पर हो गयी
कहीं पर चूक - सदा से ही
इन्हे सींचने को
नीर
दूर देश से लाये हैं।
बुधवार, 5 मार्च 2008
सोमवार, 3 मार्च 2008
पर्रिवतन 1
आस्था में पर्रिवतन,
प्रतीकों का स्थानंतरण,
हो रहा हैं तेज गति से
क्या यह सत्य हैं
तुम कोई भी व्यवहार मन से नही ,
मस्ितष्क से करते हो
स्पष्ट दिखाई देता है
एक नया अजीबो गरीब
बनाया नया संसार ।
प्रतीकों का स्थानंतरण,
हो रहा हैं तेज गति से
क्या यह सत्य हैं
तुम कोई भी व्यवहार मन से नही ,
मस्ितष्क से करते हो
स्पष्ट दिखाई देता है
एक नया अजीबो गरीब
बनाया नया संसार ।
रविवार, 2 मार्च 2008
अपने बारे मे्
मेरा नाम मयंक तिवारी हैंा मैंने Regional Instutite Of education ( NCERT-NEW Delhi) Bhopal से Post Graduate Diploma in Guidance and Counselling किया हैा इसके पहले DAVV -Indore से Psychology मे M.A. की डीग्री ली हैा दोनो पर मेरा दुसरा Rankरहा हैं ा बाकि आगे की कडीयों मे वैसे भी हमारे यहॉ कहावत है पुत के पाव पालने में ही दिख जाते हैा
अपनी पेदाइश राजा भोज के नगर मे वो भी दत्तु बॉ के मकान मे हुई है बचपन से ही नबंर-१ रहे है,भले ही पीछे से ही सही , पालन-पोषण अपने ननिहाल मतलब धार मे हुआ, पढाई-लिखाई १२ वी तक तो धार मे ही हुई फिर अपने को अपने विकास की सुझी तो अपन इंदौर आ गये ,गलती से पढने-लिखने का शौक अभी तक बरकरार है, पेट भरा ही नही वरना छोड चुके होते फिर भी अकादमिक रुप से ५ साल विधीवत रुप मनोविज्ञान की पढाई-लिखाई की औरु युनिवरसिटी मे दुसरे स्थान से बाहर हो गये साथ साथ बहुत कुछ और भी कीया , इंदिरा गॉधी से सृजनात्मक लेखन मे डिप्लोमा भी कर लीया , इंदौरयुनिवरसिटी से ही योग में सटिर्फिकेट तथा डिप्लोमाभी कर लिया है , अभी तत्काल मे वेद निपुण की दीक्षा ले रहे है,शौक बहुत है, या यु कहें कि अपन पुरे के पुरे शौकिया शक़्स है, लिखना -पढना तो है ही, नाटक -नौटंकी भी साथ ही लगे लगे है , अपन मूलरुप से शास्त्रीयता प्रेमी है,अपन को जरा सी भी भुल्-चूक पसंद नही है, संज्ञान मनोविज्ञान , योग, दर्शन , संगीत ,गाडी पर घुमना दिन- भर चटर-पटर खाना अपने जन्म से अधिकार मानते है , जीविकोपाज की भी सोचने लगे है ,सबसे पहले धनयवाद अपने मामाजी को ( अतुल शर्मा ) जिन्होने अपने को इस ब्लागर दुनिया के बारे में चेताया वरना अपन तो नीरे के नीरे ही रह जाते अपन ने उसी क्षण ठान ली कि अपन भी कुछ जरुर करेगे , और बना डाला उनके ही निर्देशन में ब्लाग , अपनी भाषा तो शुध्द है पर बिना फ्रेम में कसी पेंटिग का मजा ही कुछ और होता है वैसे ही बिना लाग लपेट के अपने बारे में लिखने का मजा ही कुछ और होता है,चुकि अपने शौक बहुत है , इसलिए अपने पास सभी विषयों पर पेंन घसिटने की आदत है , वो अपन पक्के करेगें,तो फिर से सभी ब्लागर भाईयों को धन्यवाद जिन्होने इस महान दुनिया का निर्माण किया , आशा करता आप अपनी प्रतिक्रिया से तथा भाषा संबंधी योग्यता से परिचित करायेगे ,
सधन्यवाद
अपनी पेदाइश राजा भोज के नगर मे वो भी दत्तु बॉ के मकान मे हुई है बचपन से ही नबंर-१ रहे है,भले ही पीछे से ही सही , पालन-पोषण अपने ननिहाल मतलब धार मे हुआ, पढाई-लिखाई १२ वी तक तो धार मे ही हुई फिर अपने को अपने विकास की सुझी तो अपन इंदौर आ गये ,गलती से पढने-लिखने का शौक अभी तक बरकरार है, पेट भरा ही नही वरना छोड चुके होते फिर भी अकादमिक रुप से ५ साल विधीवत रुप मनोविज्ञान की पढाई-लिखाई की औरु युनिवरसिटी मे दुसरे स्थान से बाहर हो गये साथ साथ बहुत कुछ और भी कीया , इंदिरा गॉधी से सृजनात्मक लेखन मे डिप्लोमा भी कर लीया , इंदौरयुनिवरसिटी से ही योग में सटिर्फिकेट तथा डिप्लोमाभी कर लिया है , अभी तत्काल मे वेद निपुण की दीक्षा ले रहे है,शौक बहुत है, या यु कहें कि अपन पुरे के पुरे शौकिया शक़्स है, लिखना -पढना तो है ही, नाटक -नौटंकी भी साथ ही लगे लगे है , अपन मूलरुप से शास्त्रीयता प्रेमी है,अपन को जरा सी भी भुल्-चूक पसंद नही है, संज्ञान मनोविज्ञान , योग, दर्शन , संगीत ,गाडी पर घुमना दिन- भर चटर-पटर खाना अपने जन्म से अधिकार मानते है , जीविकोपाज की भी सोचने लगे है ,सबसे पहले धनयवाद अपने मामाजी को ( अतुल शर्मा ) जिन्होने अपने को इस ब्लागर दुनिया के बारे में चेताया वरना अपन तो नीरे के नीरे ही रह जाते अपन ने उसी क्षण ठान ली कि अपन भी कुछ जरुर करेगे , और बना डाला उनके ही निर्देशन में ब्लाग , अपनी भाषा तो शुध्द है पर बिना फ्रेम में कसी पेंटिग का मजा ही कुछ और होता है वैसे ही बिना लाग लपेट के अपने बारे में लिखने का मजा ही कुछ और होता है,चुकि अपने शौक बहुत है , इसलिए अपने पास सभी विषयों पर पेंन घसिटने की आदत है , वो अपन पक्के करेगें,तो फिर से सभी ब्लागर भाईयों को धन्यवाद जिन्होने इस महान दुनिया का निर्माण किया , आशा करता आप अपनी प्रतिक्रिया से तथा भाषा संबंधी योग्यता से परिचित करायेगे ,
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