मंगलवार, 1 अगस्त 2017

"ओये"

"ओये "
यह  क्या कहा तुमने
तो फिर क्या कहूँ
तुमको कैसे मैं पुकारूँ
ज्ञात हैं सब
अज्ञात हैं भी ज्यादा
सम्वेदना के स्वर एक हैं
संवेग के प्रारूप एक  हैं
सम्बन्धों को परिभाषित
न कर पाने की विवशता एक हैं
जब एक ही हैं सब
फिर कहाँ कुछ रिक्त हैं रहा
दूर हैं पर
सूक्ष्मता में निज अनुभव एक हैं
तो चलो हम अनुरागी बने
कैवल्य पथ के सहगामी बने
सृजन के नए नियम गढ़े
सम्बोधित करे, एक दुसरे को
"ओये "

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

अनवरत प्रतीक्षा करते हुए



जब भी लिखा जायेगा
इस सदी का
प्रेम इतिहास
उसमे में भी हम पंक्ति में
सबसे पीछे ही लगेगें
जैसे सीढीयों पर भी
सबसे नीचे की सीढी पर बैठते थे हम
देखते हुए एकटक चकोर चन्द्रमा को
क्या सोचता होगा
जैसे मैं भी अभी नहीं
सोच पा रहा हूँ कुछ भी
क्या अमृत ! कुछ होता भी होगा
या बस ये तुम्हारी
आखों में छुपे
समुद्र सा अनादी अनंत हैं
कितना बोलती हैं
कितना सुनती  हैं
तुम्हारी आखें
अनवरत प्रतीक्षा करते हुए

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

“प्रतीक्षा में”



जैसे मेघ कभी कभी रूठ जाते हैं पृथ्वी से
वैसे तुम मत रूठना,
तुम चाहो तो
बोलना मत
पर चुप भी मत रहना
भले ही अकेले बोलते रहना,
तुम चाहो तो
प्रेम में बार बार गिरना
और चाहो तो न गिरना
तुम्हारी मर्जी
पर मुझे सम्हाले रखना हमेशा,
मैं तुमसे कोई प्रश्न न करुगी
तुमने क्या और क्यों किया
मैं बस प्रतीक्षा करुगी
जैसे रातरानी करती है प्रतीक्षा
भोर होने की.  

“आये क्यू फिर से” (शकुन्तला और दुष्यंत )



हे राजन
अब आये क्यू फिर से
जब न हर सको मेरे अंतर की ज्वाला
कितने निमंत्रण भेजे
कितना मनुहार मनायी,
कितने मेघदूत भेजे
कितनी मृगतृष्णा में रात बितायी हैं
कैसे तुम को बतलाऊ मन की कथा व्यथा
और तुम ही बतलाओ कितना झुपाऊ
सब अंतर के तार हुए फिर से झंकृत
अंतर में गूंज रही कौन कौन से आवाज सुनाऊ
क्या अब तक जो बिट गया
वह केवल स्मृतियों का दंश रहा, या
तुम आ ओ गे इसका जय घोष रहा
अब आओ तो रुक जाना
फिर चिर स्मृति दे मत चले जाना
हे राजन
अब क्यू आये फिर से

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

इस बार का सावन - तुम्हारे नाम




इस बार का सावन
भी तुम्हारे नाम क्या कर सकता हूं
बिना पूछें तुम से,
जैसे हर बार के सावन किये हैं
आज तक,
तुम्हारे अज्ञात मैं भी
बहुत कुछ तुम्हारा
या
सब कुछ तुम्हारा
वैसे के वैसा ही रख छोड़ा हैं मैंने आज तक,
जैसे हर बार का सावन
किये देता हूँ तुम्हारे नाम.