"ओये "
यह क्या कहा तुमने
तो फिर क्या कहूँ
तुमको कैसे मैं पुकारूँ
ज्ञात हैं सब
अज्ञात हैं भी ज्यादा
सम्वेदना के स्वर एक हैं
संवेग के प्रारूप एक हैं
सम्बन्धों को परिभाषित
न कर पाने की विवशता एक हैं
जब एक ही हैं सब
फिर कहाँ कुछ रिक्त हैं रहा
दूर हैं पर
सूक्ष्मता में निज अनुभव एक हैं
तो चलो हम अनुरागी बने
कैवल्य पथ के सहगामी बने
सृजन के नए नियम गढ़े
सम्बोधित करे, एक दुसरे को
"ओये "
यह क्या कहा तुमने
तो फिर क्या कहूँ
तुमको कैसे मैं पुकारूँ
ज्ञात हैं सब
अज्ञात हैं भी ज्यादा
सम्वेदना के स्वर एक हैं
संवेग के प्रारूप एक हैं
सम्बन्धों को परिभाषित
न कर पाने की विवशता एक हैं
जब एक ही हैं सब
फिर कहाँ कुछ रिक्त हैं रहा
दूर हैं पर
सूक्ष्मता में निज अनुभव एक हैं
तो चलो हम अनुरागी बने
कैवल्य पथ के सहगामी बने
सृजन के नए नियम गढ़े
सम्बोधित करे, एक दुसरे को
"ओये "