झील चुप हैं ,
पर झील का पानी बहुत बोलता हैं तुम्हारे कानों में
झील अपनी आखें बंद किये ,कुछ नहीं देखती
झील का पानी देखता हैं तुमको
झील की हथेली पर एक तिल देखा हैं
झील के पानी ने एक बूंद आंसू की गिराई हैं
झील एक आदत हैं ,झील के पानी की
झील के पानी की प्रार्थना हैं झील
झील चुप हैं
कब से ,झील भी नहीं जानती
उसके शब्द ,वाक्य, भाषाएँ कौन सी हैं
क्या कोई जानता हैं
तुम्हारे होने न होने से झील नहीं हैं
झील हैं सनातन प्रतीक्षारत तुम्हारे होने की
तुम झील पर कुछ देर ठहर कर चले जाते हो
झील नहीं जाती कही
वह नहीं कहती कभी फिर आना
फिर भी तुम लौट आते हो एक समय पर
झील चुप हैं ,
पर झील का पानी बहुत बोलता हैं तुम्हारे कानों में
1 टिप्पणी:
बहुत सुन्दर हमारे भोपाल झील की याद सताने लगी पढ़कर और मन सैर करने को हो रहा है ..
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