हे राजन
अब आये क्यू फिर से
जब न हर सको मेरे अंतर की ज्वाला
कितने निमंत्रण भेजे
कितना मनुहार मनायी,
कितने मेघदूत भेजे
कितनी मृगतृष्णा में रात बितायी हैं
कैसे तुम को बतलाऊ मन की कथा व्यथा
और तुम ही बतलाओ कितना झुपाऊ
सब अंतर के तार हुए फिर से झंकृत
अंतर में गूंज रही कौन कौन से आवाज सुनाऊ
क्या अब तक जो बिट गया
वह केवल स्मृतियों का दंश रहा, या
तुम आ ओ गे इसका जय घोष रहा
अब आओ तो रुक जाना
फिर चिर स्मृति दे मत चले जाना
हे राजन
अब क्यू आये फिर से
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