गुरुवार, 27 जुलाई 2017

“प्रतीक्षा में”



जैसे मेघ कभी कभी रूठ जाते हैं पृथ्वी से
वैसे तुम मत रूठना,
तुम चाहो तो
बोलना मत
पर चुप भी मत रहना
भले ही अकेले बोलते रहना,
तुम चाहो तो
प्रेम में बार बार गिरना
और चाहो तो न गिरना
तुम्हारी मर्जी
पर मुझे सम्हाले रखना हमेशा,
मैं तुमसे कोई प्रश्न न करुगी
तुमने क्या और क्यों किया
मैं बस प्रतीक्षा करुगी
जैसे रातरानी करती है प्रतीक्षा
भोर होने की.  

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