शनिवार, 19 अप्रैल 2014

"कस्तूरी -मृग"



तुम्हे क्या उपहार दूँ 
कैसे सर्वस्व त्याग दूँ
बीते निशा के कितने प्रहर कैसे 
उनका कैसे हिसाब दूँ 
कैसे बताऊ संवेदना कितनी बार रूठी हैं 
और मैंने कितनी बार कैसे उसे मनाया 
जीर्ण -शीर्ण होता रहा हर बार 
फिर भी नित दिन नए सोपान चढ़ता रहा 
संवेदनाओं के धरातल पर खुद ही को छलता रहा 
निज धर्म ,देश काल में 
कैसे धार्मिकता त्याग दूँ
कानन के बीच कस्तूरी मृग बन 
कब तक कितना विचरण करूँ 
तुम ही कहो तुम्हे क्या उपहार दूँ 
किस नयी उपमा को तुम  पर वार दूँ 
तुम ही कहो तुम्हे क्या उपहार दूँ 


2 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बेहतरीन...विचारणीय भाव

कविता रावत ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति!