“ अपना अपना सच “
कितना अजीब हैं यह
अपना अपना सच
यक्ष-प्रश्न सा हमेशा विद्यमान
निर्विकार सा
मुंह उठाये प्रस्तुत होता हैं,
जान कर भी
कितना अनजाने बना रहना चाहते हैं हम
बिल्कुल पुरानी स्मृतियों की तरह
मौखिक होने से बचते हुए
भाविक होते रहते हैं
प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से
अपने अपने सच के साथ
कभी कभी नितांत
अकेले में मिल भी जाता हैं
तो भरसक प्रयास करते हैं
वो हम से कुछ पूछें ना
क्योंकि
सब जानते हैं
अपना- अपना सच
अपने चारों और फैलाये झूठ के साथ.
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