मंगलवार, 29 जुलाई 2008

कार्तिक पूर्णिमा

कालिदास की नगरी में वह तट
जाता जिस ओर यह पथ
रामघाट पर बढ़ता जाता
धीरे-धीरे जमघट
संध्या की उस बेला में
होती है आरती
ढोल मँजीरे बजते हैं
जन जन इस ओर उमड़ते हैं
दीपदान करती माताएँ
कालिदास की शकुन्तलाएँ
उस शीतल, स्तब्ध जल में
छोड़ती दीपमालाएँ
अहा! दृश्य देख
किस जन के मन के तार न झँकृत होते जाते
सब गुणी जन यही कहते
कालिदास की नगरी का यह तट
आता इस ओर वही पथ

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