जनांतिक
जन से जन की बातें
मंगलवार, 29 जुलाई 2008
परिवर्तन-२
एक परिर्वतन
महसूस करती हैं
सभी इन्द्रियाँ
बिना एक दूसरे को बनाए
अपने अपने अनुभव
सभी परिभाषाएँ
परिभाषा के कथ्य से आगे
कहीं बहुत आगे निकल कर
पीछे मुड़कर देखती हैं
विखण्डित मान्यताओं के समूह
कई बार
आमने-सामने होते हैं
बिल्कुल गूंगे-बहरों की तरह
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