गुलामी
शायद हर एक के अंदर तक
मन मस्तिष्क तक
जगह बना बैठी है
प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष का प्रश्न
अब समकालिक नहीं प्रतीत होता
प्रकृति ने साहचर्य बनाया था
आश्रितता केवल एक पक्षीय
तुमने विकास के नाम पर
एक पक्षीय नियम गढे़
लेकिन तुमने कभी स्वीकारा नहीं
तुम्हारा तथाकथित विकास
गुलामी का विकास है
तो तुम क्या कर सकते हो - एक प्रश्न
इस तेज विकासवान कहे जाने वाले मनुष्यों से
तेज रफ्तार शहरों से
क्या तुम एक पल स्वतंत्रता
जिये हो
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