हम लौट कर
फिर से
उसी जगह जाना
चाहते हैं जहाँ से
हमारी सारी की सारी
आस्था या कि सभ्यता
पंख लगाकर
उन्मुक्त होकर
खुले आकाश में उड़ती है।
क्योकि
धीरे-धीरे पंछी को
एक खुला आकाश भी
अनंत की कैद
लगने लगता है
वो उससे मुक्त होने की
असफल भरसक
कोशिशें करना चाहता है
पर
सब नाकाम
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