एक बार फिर क्या होऊँ तैयार
हाँ, वही असफलता
यह कौन सी बार
विपद् का लेखा-जोखा
टूटा अंतर का, एक और तार
हुआ नहीं क्यों कर ऐसा इस बार
सर्वत्र
सुफलित होता दिन - यान
सतत् क्रियाशील यह
मन का क्या कोई हो सकता है प्रतिहारी
माटी-माटी छूता जाता
नव अंकुरित हो जाता
हाँ, वही पतझड़ फिर एक बार
भर ग्रीष्म में
खिला वही अमलतास
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