रविवार, 27 जुलाई 2008

देश का भविष्य

हमने कुछ
नन्हें पौधे उपजाये हैं
सोचा था
पुष्प खिलेगें
नव बसंत में
नव प्रभात के
संग इनका
उत्पात मचेगा
हर तरू की शाखें
इनके लिए मनुहार गावेगी
मौन समीर
इनके यौवन की बात छिपाएगा
पर हो गयी
कहीं पर चूक - सदा से ही
इन्हे सींचने को
नीर
दूर देश से लाये हैं।

4 टिप्‍पणियां:

समय चक्र ने कहा…

ब्लागजगत में आपका स्वागत है और हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दे.

Udan Tashtari ने कहा…

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

Unknown ने कहा…

धन्यवाद।

Amit K Sagar ने कहा…

अच्छी कविता. चिंतन ज़ाहिर. लिखते रहिये. शुभकामनाएं.
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