मंगलवार, 29 जुलाई 2008

सभ्यता

आज मुझको चिड़िया ने ड़ाँटा है
चिड़े ने फटकार लगाई है
मेरा मन काँपा है
एक मौन रूलाई आयी है
हुआ कुछ यूँ कल रात
मेरे हाथों बिजली का फ्युज उड़ गया पिछली रात
मेरे घर के,
मीटर के नीचें
चिड़ा चिड़ी ने,
ड़ेरा जमाया ब्याह के बाद
नन्हें बच्चों ने जन्म पाया
मीटर के नीचे ही
अपना स्वर्ग जैसा घर पाया
मैं पहुँचा उनके स्वर्ग के नजदीक
मुझको कोई आतकी जान
कितना चिड़ा चिड़ी ने शोर मचाया
मुझको भी चिड़िया के छोटे बच्चों ने
अपना पीली चोंच वाला मुँह दिखलाया
डराया है,
लौटा हूँ
मेरे पीछे पीछे आकर
आज मुझको चिड़िया ने ड़ाँटा है
चिड़े ने फटकार लगाई है
बिना पूछे नहीं आते उसके घर में
क्या ऐसी ही सभ्यता तुमने पाई है।
आज मुझको चिड़िया ने ड़ाँटा है
चिड़े ने फटकार लगाई है।

1 टिप्पणी:

S ने कहा…

aap ki kavita mein bahot gehrai hai.kitini pyari kavita aapne banai hai.ab jaldi batao kab ho rahi tumhari sagai hai.